Monday, August 29, 2011

समाधान

2011-08-19 06.56.03
कैद  हो ना सकेगी बेईमानी चंद सलाखों के पीछे
घर ईमानदारी के  बनें तो कुछ बात बन जाए

मिटता नहीं अंधेरा  कोठरी में बंद करने से
एक दिया वहीं जले तो कुछ बात बन जाए

ना   खत्म होगा फांसी से कत्लेआमों का सिलसिला
इंसानियत के फूल खिलें तो कुछ बात बन जाए

बस तुम कहो और हम सुने  है इसमें नहीं  इंसाफ
हम भी कहें तुम भी सुनो तो कुछ बात बन जाए

हम चलें  तुम ना चलो तो  है धोखा  रिश्तेदारी में
थोड़ा तुम चलो थोड़ा हम चलें तो कुछ बात बन जाए
.....रजनीश (29.08.2011)

Friday, August 26, 2011

खोने का अर्थशास्त्र

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सूरज की रोशनी में
चमकता एक खूबसूरत फूल
बिखेरता है खुशबू
बस एक स्वार्थ उसका
कि और लग सकें फूल कहीं
पर जबर्दस्ती नहीं करता कभी ,
कल कल बहता झरना
एक बूंद पानी भी
नहीं रखता अपने लिए
पानी का बह जाना
ही है उसका होना
आकाश में उड़ता बादल
एक-एक बूंद बरस जाता है
आखिरी बूंद के साथ
हो जाता है खत्म
पर वो बरसता है 
ताकि बन सके एक बार फिर से
किसी छत पर बरसने के लिए
पर हम कुछ सीख न सके
फूल से , झरने से , बादल से
और बस लड़ते हैं
अपने अस्तित्व
अपने अहम की लड़ाई
कुछ पाने के लिए
पर दरअसल खोने में है  पाना
.....रजनीश (26.08.2011)

Saturday, August 20, 2011

खालीपन

एक शून्य नज़र आता है
कभी कभी मन की
चहारदीवारी पर 
धीरे धीरे पूरा मन
डूब  जाता है
शून्य की दीवार के अंदर
और बाहर ही नहीं आता
उस दीवार के सहारे
पीठ टिकाये मैं सो जाता हूँ 
कभी लगता है
ऊंचाई से कूद गया
फ्री-फॉल  की तरह
मैं चलता रहता हूँ
आँखें मूँदे बस ढलान पर लुढ़कती
एक गेंद की तरह
और गेंद जब रुकती है
ढलान खत्म होने पर
शून्य जा चुका होता है
तब पलटना होता है
उस ढलान पर और
एक चढ़ाई करनी पड़ती है
वो शून्य आता कहाँ से है
पता नहीं चलता
वैसे इस शून्य को
हर मन में आते-जाते देखा है ...
....रजनीश ( 20.08.2011)

Saturday, August 13, 2011

असलियत


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नापना चाहते हो अपनी ऊंचाई
हिमालय के सामने खड़े हो जाना
जानना चाहते हो अपनी गहराई
सागर की लहरों में झांक लेना
परखना चाहते हो अपनी सीमा
क्षितिज को छूने की कोशिश करना
महसूस करना चाहते हो अपनी व्यापकता
बादलों के ऊपर से उड़ कर देखना

तब पाता चलेगा  तुम्हें
कितने छोटे हो तुम
कुछ भी तो नहीं
एक अंश मात्र
चोटी पर पहुँच कर
तुम हिमालय नहीं बन सकते
सागर को पार कर तुम सागर नहीं बन जाओगे

अपने चारों ओर जो ताना-बना बुना है तुमने
वो कितना कमजोर कितना झूठा है
तुम पहुँच गए दूर ग्रहों तक
बस एक तितली की तरह

तुम्हारा वजूद तुम्हारी धारणाएँ
तुम्हारा स्वत्व तुम्हारी शक्तियाँ
सिर्फ भ्रम है तुम्हारा ही पैदा किया हुआ
तुम और तुम्हारा ये विशाल मायाजाल
कुछ भी तो नहीं
तुम सिर्फ एक लहर हो
जो सिर्फ कुछ पलों के लिए होती है
और फिर गिरकर  खो  जाती है
सागर के सीने में 

इसीलिए झुको ,
धरती की गोद में  बैठकर देखो 
एक बच्चा बनकर
और बह जाओ
जीवन की धारा में
तिनके की तरह
.....रजनीश (12.08.2011)
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