पिता वृक्ष
पिता पालक
पिता मित्र
पिता समर्थक
पिता दाता
पिता आलोचक
पिता माझी
पिता शिक्षक
पिता सारथी
पिता रक्षक
पिता ईश्वर
पिता जनक
...On father's Day
...रजनीश (17.06.18)
बारिश तब भी होती थी
बारिश अब भी होती है
पहले बारिश के खयाल से ही
भीग जाया करते थे
अब ऐसे हो गए हैं
कि बूंदें फिसल जाती हैं बदन से
दिल सूखा रह जाता है
बारिश तब भी होती थी
बारिश अब भी होती है
एक वक्त था जब
गिरती बूंदों को गले लगाने
बादलों के पीछे भागते थे
अब घर में कैद हो
करते हैं इंतजार
बादलोँ के बरस जाने का
बारिश तब भी होती थी
बारिश अब भी होती है
..रजनीश (15.06.18)
वक्त गुजरता जाता है
समय बदलता जाता है
इक पल आता
इक पल जाता
पल दर पल मंजर बदलता
संसार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है
जो मैं था
वो अब मैं नहीं
जो तुम थे
वो अब तुम नही
पल दर पल बदलते धागे
करार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है
जो कोपल थी
अब पौधा है
जो पौधा था
अब दरख्त है
धरती पर दिन रात बदलते
और उसका श्रृंगार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है
जो बूंद में था
अब दरिया में
जो दरिया में
अब सागर में
सागर से बादल में जा
कहीं और बरसता जाता है
समय बदलता जाता है
ना सूरज वही
ना चांँद वही
ना धरती और ब्रम्हांड वही
संग घड़ी की टिक-टिक
कण-कण का रुप आकार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है..
....रजनीश (28.05.18)
जिंदगी के सफर में
मंजिल दर मंजिल
एक भागमभाग
में लगा हुआ
हमेशा हर ठिकाने पर
यही सोचा
कि क्या यही है वो मंजिल
जिसे पा लेना चाहता था
पर मंजिल दर मंजिल
बैठूँ कुछ सुकून से
इसके पहले ही
हर बार
मिल जाता है
एक नया पता
अगली मंजिल का
अब तक के सफर में
कई कदम चलने
कई जंग लड़ने
वक्त के पड़ावों को
पार करते करते
खुद को भुला
मंजिलों का पीछा करने के बाद
अब सोचता हूँ
आखिर मंजिलें है क्या
रुकता त़ो हूँ नही उनपर
वक्त तो रस्ते में ही गुजरता है
इसलिये अब
मंजिलों में खुशियाँ तलाशना छोड़
रस्ते की ओर देखता हूँ
और पाया है मैने
कि सारी खुशियाँ तो
रस्ते पर ही बिखरी पड़ी हैं
जबसे इन पर नजर पड़ी है
इन्हें ही बटोरने में लगा हूँ
और अब हालात ये हैं
कि ख्याल ही नहीं रहा
मंजिलों का,
सफर बदस्तूर जारी है !
.....रजनीश (20.05.18)
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....