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Thursday, March 31, 2011

गुलाबजल

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आओ
बताऊँ  एक बात तुम्हें ,
मुझे तलाशते
जब तुम्हारी आँखों में गड़ता है कोई प्रश्नचिन्ह
कुछ धुंधला सा देखते हो ,
मैं कुछ शब्दों का गुलाबजल
बना कर लगा देता हूँ तुम्हारी आँखों में
मेरी झोली में शब्द हैं गिने-चुने
नतीजतन कुछ सवाल शब्दों में ही फंस जाते है
फिर शब्दों के चेहरे बदल कर पेश करता हूँ
कि थोड़ी और ठंडक पहुंचे
तुम्हारी आँखों को और
शब्द सफल हो जाएँ ,
पाँच अक्षरों की खूबसूरती को
बना  देता हूँ दो अक्षर का चाँद,
पर साथ घुस आता है 
दो शब्दों का दाग,
कैसे समेटूँ
सब कुछ तुम्हारे लिए..
कुछ शब्दों के मटके और
अविरल बहता जल,
इसलिए बेहतर होगा तुम आंखे बंद कर लो
महसूस करो ये प्रवाह ,
और एक स्पर्श में 
पूरा अभिव्यक्त हो जाऊंगा मैं  ...
...रजनीश ( 30.03.11)

Monday, March 7, 2011

जड़त्व

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कई  बार  मरा,
और फिर से  जिया हूँ मैं,
पर  हर बार ही ज़िंदगी
वही रही पुरानी,
बस जैसे पत्ते झड़ गए
और फिर से आ गए,
कभी कुछ  घोसलें बन गए मुझ पर,
कभी कोई राहगीर
दो पल को रुक गया मेरी छाँव में,
कभी कोई फूल ले गया,
कभी किसी ने फल तोड़ा,
किसी को कांटे लगे,
हवाओं ने कई बार झुकाया मुझे,
साल दर साल
परतें चढ़ती रहीं मुझ पर ,
और अब तो बहुत विस्तार हो गया है मेरा,
मैंने सूरज और चंदा दोनों की किरणों को जगह दी है ,
और चाँदनी को भी दिया हैं बिछौना,
मेरे पास से गुजरती रही हैं ढेरों ज़िंदगानियां,
पर ठिकाना किसी ने नहीं बनाया यहाँ,
मुझे पता है कि, तुम
रहते हो दूसरे किनारे पर ,
क्या करूँ , नहीं पहुँच सकता तुम तक,
समय के साथ चलते-चलते
मेरी जड़े भी बहुत भीतर तक चली गईं
और अब भी वहीं खड़ा हूँ
जहां कभी  शायद
तुमने ही तो लगाया था मुझे ...
कम से कम देख तो सकते हो  ...
कभी समय निकाल तुम ही चले आते इधर ...
  ....रजनीश (07.03.2011)

Saturday, March 5, 2011

तुमने कहा था

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तुमने
कहा था,
कि जो चाँद  उस  रात  ,
तारों की चादर ओढ़े ,
तुम्हारी खिड़की पर आके बैठा था,
उसमें  एक पत्थर पे
खुदा मेरा नाम,
तुम पढ़ ना सके थे ...
पर मुझे उस पत्थर के करीब ,
धूल में बसे
तुम्हारे कदमों के निशान,
अब भी दिखते हैं ...
वो चाँद ,
मेरी खिड़की पर भी आता है, अक्सर ...
....रजनीश (05.03.2011)

Sunday, February 27, 2011

कुछ प्रश्न...

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[1]
जीवन ,माना चक्र है ।
पर कहते हो
है ये   सीढ़ी भी ,
कहाँ  टिकी ऊपर  ये सीढ़ी ?
वो छोर,
क्यूँ नहीं दिखता है ?

[2]
प्रेम धुरी से बंधे,
दो पहिये,
जीवन पथ पर चलते हैं ।
इसे हाँकता कौन  सारथी ?
वो  चेहरा,
क्यूँ  नहीं  दिखता है ?

[3]
तुमने छोड़ दिया था ,
सब कुछ ,
क्या सच में  वो अब पास नहीं ?
त्याग  तुम्हारा,
हरपल रहते   दंभ  के संग
क्यूँ दिखता है ?

[4]
प्रेम तुम्हें है
प्रेम मुझे है,
और अगर  एकात्म हैं हम ।
फिर हरदम, हमारे बीच
रखा ये समझौता
क्यूँ दिखता है ?

[5]
प्रखर मस्तिष्क,
संवेदनशील,
और  है निपुण  सम्प्रेषण में ,
फिर वो दोपाया, पूंछकटा
जानवर सा
क्यूँ दिखता है ?
.....रजनीश (27.02.2011)

Friday, February 25, 2011

परिचय

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पर्वत मैं हूँ स्वाभिमान का,
मैं  प्रेम का महासमुद्र हूँ ,
मैं जंगल हूँ भावनाओं का,
एकाकी  मरुस्थल हूँ मैं  ,

सरित-प्रवाह  मैं परमार्थ का,
मैं  विस्मय का सोता हूँ ,
हूँ घाट एक , रहस्यों का,
संबंधों का  महानगर हूँ मैं ,

झील हूँ  मैं एक शांति की,
मैं उद्वेगों का ज्वालामुख हूँ,
हूँ दर्द भरा काला बादल,
उत्साह भरा झरना हूँ मैं ,

 दलदल हूँ मैं लालच का,
मैं घमंड का महाकुंड हूँ,
हूँ गुफा एक वासनाओं की,
भयाक्रांत वनचर हूँ मैं ,

 दावानल हूँ विनाशकारी ,
मैं  शीतल मंद बयार हूँ ,
हूँ सूर्य किरण का सारथी,
प्रलयंकारी भूकंप हूँ मैं,

मैं हूँ जनक, मैं प्राणघातक,
मैं पोषित और पोषक मैं हूँ,
हूँ इस प्रकृति का एक अंश,
सूक्ष्म, तुच्छ मनुष्य हूँ मैं ..
....रजनीश (25.02.2011)

Tuesday, February 22, 2011

बे-मौसम बरसात

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दो-तीन दिनों से कर रहे थे इशारा , और कल गरजे सुबह-सुबह
जैसे मुनादी कर रहे हों , कि हम आ गए हैं और बस शुरू हो गए बरसना ...
कल दिन भर बादल कुछ ऐसे बरस रहे थे , जैसे कुछ हिसाब रहा गया था
जिसे पूरा करना था , कल का दिन फ़रवरी का नहीं था ...

[1]
एक बादल रहता है ,
दिल के कोने में ....
कल वो फिर गुजरे दिल के रस्ते से,
और जाते-जाते
उस बादल को बरसा गए ।
सुखाया था इक दर्द ,
रोज़मर्रे की धूप में,
इस बेमौसम बरसात ने
उसे फिर से गीला कर दिया ....

[2]
जहां कभी लिखी थी मैंने , कुछ पत्तों पर  कहानियाँ
वो पूरी बगिया ही मुझे झाड़-झंखाड़ सी लगी
तब झाड़ा था मैंने उन सूखे दर्दीले पत्तों को ,
कुछ आशाएँ डाली थी मैंने क्यारियों में,
और कई दिनों  'खुद' से सींचा था... 
अभी आए ही थे कुछ फूल उम्मीदों के,
नई उमंगों के बस बौर फूटे थे,
तभी क़िस्मत के बादलों ने
ढंका ये बासंती मंज़र ,
बेवक्त हुई  बारिश से ,
पूरा सपना ही बह गया ...

[3]
मैं दुखी हूँ,
क्यूंकि बेवक्त बरस गया एक बादल ,
मैं  रोता हूँ उन चंद बासंती लम्हों के लिए
जो इस बरसात में भीग , गल गए,
बेवजह का रोना है मेरा  ,
क्यूंकि वो लम्हे  बस खो गए हैं रस्ते में ,
फिर  मिल जाएँगे अगले मोड़ पर ,
न भी मिले,  तो  और भी कई ग़म हैं,  वजहें हैं  ...
पर वो क्या करे ?
जिसके खेत में बादल बरस गया बेमौसम,
जहां   बरसात ने बहाया और सड़ाया 
बीजों को, जिन्हें बोया था पसीने ने...
वो क्या करे ?
जिसकी  साल भर की कमाई,
बोरों में भरे-भरे , बरसात को प्यारी हो गई
उसका बसंत तो बहुत-बहुत दूर चला गया होगा ....
हो सकता है हमेशा के लिए ….
......रजनीश (21.02.2011)

Sunday, February 20, 2011

दुनिया

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जहां रहता हूँ  मैं, है वो  इक दुनिया,
जहां घर तुम्हारा  , वो भी इक दुनिया...

देखा था जिसे ख्वाब में ,  वो इक दुनिया,
हक़ीक़त में जो मिली ,  वो भी इक दुनिया...

था छोड़ा कल जिसे,  वो इक दुनिया,
कल मिलूँगा जहां तुमसे,  वो भी इक दुनिया...

बाहर  मिली जो मुझसे,  वो इक दुनिया,
ज़िंदा जो मेरे भीतर , वो भी इक दुनिया...

है तेरी और  मेरी, साझा वो इक दुनिया,
है ना तेरी  और ना मेरी ,  भी इक दुनिया !

तेरी दुनिया के अंदर मेरी, वो  इक दुनिया,
मेरी दुनिया के अंदर  तेरी, भी इक दुनिया...

जो मेरे कदमों तले कुचली, वो थी इक दुनिया,
जिसे  हाथों में है सम्हाला , ये भी इक दुनिया ...
.....रजनीश (20.02.2011)

Friday, February 18, 2011

कुछ हल्के-फुल्के से...

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(1)
मेरी दोस्ती पर, इतना एतबार करिए,
गर मिस करते हैं , मिस्ड कॉल  करिए !
(2)
हैं वो सामने, उनकी  बेरुख़ी को क्या कहिए ...
हमसे कहते हैं कि  'कवरेज़ एरिया' से बाहर हो !
(3)
अब उसके दर तक, कोई रास्ता नहीं जाता ,
अफसोस कि वो 'नंबर' अब मौजूद नहीं हैं ...
(4)
ये दिल है बेकरार , कहीं लगता नहीं ,
बोर ये होता है, जां 'रिमोट' की जाती है...
(5)
हर बार की तरह,  वो कल भी मुझसे रूठ गया,
उसे मनाने  मैंने, फिर से एसएमएस किया...
(6)
कभी दिखा नहीं, पर  होगा वो चाँद सा मुखड़ा ,
एक आरजू है दिल में , हम 'चैट' किया करते हैं ...
(7)
दिल की आवारगी भी क्या-क्या जतन करती है ,
उसने मोबाइल में दो-दो 'सिम' लगा रक्खा है ...
(8)
खो गए थे वो, इस दुनिया की भीड़ में कहीं,
फ़ेस-बुक ने वो हाथ, मेरे हाथों पे रख दिया ...
(9)
सुना था उसकी दुनिया में, चिड़िया चहकती है,
पर यहाँ  , दोपाया इंसान ट्वीट  करता है ...
.....रजनीश (18.02.2011)
अगर पसंद आए तो बाकी फिर कभी !!

Thursday, February 17, 2011

दृष्टिभ्रम

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कंपकंपाते होठों पर 
अटके से थे शब्द कुछ ...
हवा से हिलते केश में,
ढँका मानो आमंत्रण...
कांपते हाथों में,
फंसी थी एक पाती...
झुकी पलकों में ,
छुपा सा लगा समर्पण ...
उकेरता था पाँव, कुछ वृत्त ,
उसने, लगा सब कुछ कहा था ,
पर, था छुपाता दरअसल वो एक मोती,
जो बचा नज़रें वहीं, पलक से गिरा था ....
हाथ में उसके सिर्फ एक नज़्म थी,
जिसमें कुछ नहीं बस अलविदा लिखा था...
...............रजनीश (16.02.2011)

Monday, February 14, 2011

प्रेम

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तुम कहो  जो ,चाँद-तारे
इस धरा पर तोड़ लाऊं ,
है असंभव ये , कहो तो,
सर्वस्व अपना मैं लुटाऊँ ...

अनुभूत कर सकते तभी,
जब पथ पर चलने तुम लगो ,
हृदय ये मेरा ,  पथ है वो,
आओ, चलो , खुद से मिलो ...

प्रेम होता स्व को खोकर ,
दूसरा बन जाओ तभी ,
मैं नहीं हूँ , तुम हूँ मैं;
क्षण भर को तो, देखो कभी...

खुद को खो दो, प्रेम पा लो,
प्रत्येक कण में प्रेम है ,
अप्रेम जैसा कुछ नहीं ,
शाश्वत, जगत में प्रेम है ...

हृदय होते नहीं है पूरक,
वे स्वयं सम्पूर्ण हैं,
जब पूर्ण  मिलता पूर्ण में ,
तब प्रेम होता पूर्ण है...

.........रजनीश (14.02.2011)

Saturday, February 12, 2011

मिल गया बसंत...

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कल पढ़ा था अखबार में ,
बसंत आ गया ,
कुछ बासन्ती पंक्तियों के साथ ,
छपी थी एक तस्वीर फूलों  की,
पर खुशबू नहीं मिली उसमें ...
मैंने कोशिश की एक फूल
खींच कर निकालने की,
पर वो पन्ने से बाहर नहीं आया ....
अपने मन को टटोला ,
वहाँ नहीं पहुंचा था बसंत...

बाहर निकला मैं,
रस्ते-रस्ते, गलियों-गलियों
दीवारों ,मकानों, चौराहों सब जगह देखा ,
पर कंक्रीट के जंगल में
बसंत कहीं नहीं मिला,
वो चिड़िया भी नहीं मिली छत की मुंडेर पर,
जो बसंत के पास ही रहती थी,
पता चला उसने वो जगह दे दी है ,
लोहे की एक मीनार को,
तलाशते-तलाशते कई जगह
निशान मिले, उसके कदमों की छाप मिली,
पर बसंत नहीं मिला...
वो तो यहाँ से कब का चला गया था,
और बस यादें अब सिमटी थी उसकी,
एक 'वीभत्स' मुरझाए से कागज के अखबार में ,
जो खुद सबूत  था एक हत्या का,

शहर के छोर पर जो दाई रहती है ,
उसने कहा कि सामने उस गाँव में जाओ,
शायद वहाँ  होगा ,
पर 'गाँव' बीच रस्ते में ही मिल गया ,
वो तो शहर की तरफ भाग रहा था,
पीछे जो जमीन छोड़ी थी उसने
उसके सीने मेँ उगी गहरी धारियाँ
देखकर मैं लौट गया थका हारा,

पर  इच्छा बड़ी तीव्र थी ,
आखिर ढूंढ ही निकाला उसे ,
गाँव से लगी पहाड़ी के पार ,
देख ही लिया उसका संसार
मिट्टी की खुशबू,  झरने की कलकल,
कू-कू की गूंज , खिलती कलियों की अंगड़ाई,
हौले से मटकती बयार के संग झूलती  बौर ,
सुनहली किरणों मेँ चमकता एक-एक रंग ,
वो कर रहा था नृत्य...

प्रेम और जीवन की अभिव्यक्ति हर पल मेँ थी,
हर एक  पत्ते  , हर एक कण मे था वो वहाँ ,
वैसा का वैसा ...
देखना चाहो तो तुम भी आ सकते हो,
पर दबे पाँव आना यहाँ,
अपनी छाप न पड़ने देना मिट्टी मेँ ,
रुकना नहीं यहाँ ,
इसे बस साँसों मेँ भरकर तुरंत
लौट जाना दबे पाँव ,
नहीं तो बसंत भाग जाएगा , समझे ?
..........रजनीश (12.02.2011)

Friday, February 11, 2011

दोस्त

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वो कुछ कहता नहीं,
और मैं सुन लेता हूँ,
क्योंकि उसकी बातें
मेरे पास ही रखी हैं,
उसकी आवाज़ में झाँककर
कई बार अपने चेहरे पर चढ़ी धूल
साफ की है मैंने ,
अक्सर उसकी वो आवाज़,
वहीं पर सामने होती है
जहां तनहा खड़ा ,
मैं खोजता रहता हूँ खुद को,
उस खनक में ,
रोशनी  होती है एक
जो करती है मदद,
और मेरा हाथ पकड़
मुझे ले आती है मेरे पास,
उसकी आवाज़ फिर  सहेजकर 
रख लेता हूँ....
दोस्त है वो मेरा .....
.............रजनीश (10.02.2011)

Tuesday, February 8, 2011

परिवर्तन

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अब तुतलाता नहीं, पर बोलता नहीं हूँ,
अब  रोता नहीं , पर हँसता नहीं हूँ,
अब चीखता नहीं, पर शांत नहीं हूँ,
अब रूठता नहीं, पर मानता नहीं हूँ,
अब पूछता नहीं, पर जानता नहीं हूँ,
अब रटता नहीं, पर सीखता नहीं हूँ ,
अब गिरता नहीं, पर उठता नहीं हूँ,
अब छीनता नहीं , पर देता नहीं हूँ,
अब चुराता नहीं, पर बांटता नहीं हूँ,
अब तोड़ता नहीं, पर जोड़ता नहीं हूँ,
अब लड़ता नहीं, पर जुड़ता नहीं हूँ,
अब मारता नहीं, पर बचाता नहीं हूँ,
अब बेसुरा नहीं, पर गाता नहीं हूँ,
अब गुमता नहीं , पर मिलता नहीं हूँ,
अब  छोटा नहीं , पर बड़ा नहीं हूँ...
...........................
बड़ा लंबा है इन्सानियत के घर का रास्ता !
चल तो रहा हूँ इस पथ में , पर आगे बढ़ता नहीं हूँ ....
........रजनीश (08.02.11)

Sunday, February 6, 2011

आस

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एक दिन, चढ़ गया है..
एक पत्ता, झड़ गया है..
एक दोस्ती,  टूट गयी है..
एक डोर, छूट गयी है..
एक पता, गुम गया है..
एक रास्ता, रुक गया है..
एक रंग , धुल गया है..
एक बंधन, खुल गया है..

एक कमरा, खाली है..
एक क़रार, जाली है..
एक किस्मत, रूठी है..
एक मुस्कान, झूठी है..
एक रिश्ता, अज़ीब है..
एक दिल, गरीब है..
एक डगर, अनजानी है..
एक सौदा, बेमानी है..
एक रात , बहुत लंबी है..
एक बात , बहुत लंबी है..
...............
...............
एक मयखाना , वहाँ साक़ी है..
एक जाम , अभी बाकी है..
एक सपना, अधूरा है..
एक पन्ना,  कोरा है..
एक आस , अभी ज़िंदा है..
एक इंसान, शर्मिंदा है..
एक धड़कन, मचलती है..
एक ज़िंदगी, चलती है ..…..
………………..रजनीश (06.02.2011)

Saturday, February 5, 2011

आँसू

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कुछ बेवफ़ा बूंदों ने
छोड़ दिया दामन,
और अँखियों को रुला ,
जमीं की हो गईं ....
......
एक  बूंद और थी ,
जिसने न छोड़ा हाथ और
न दिया साथ
वो  किनारे पर बैठी –बैठी 
हवा में खो गई...
....
पर पलकों के साये में ,
जो झील रहती है,
उसमें बहुत पानी है ....
उसे कुछ गहरा किया है
और किनारों पर
थोड़ी मिट्टी डाली है ....
अगले सावन में तो पूरी भर जाएगी ।
.......रजनीश (05.02.2011)

Monday, January 31, 2011

एक अफ़साना

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हर रोज़ ये गुनाह   मैं सौ बार करता हूँ,
वो  नहीं  इस रास्ते , क्यूँ इंतजार करता हूँ...

सपना था कि  कभी मिलके  चलेंगे दो कदम,
हँस के  कहा था उसने, क्यूँ एतबार करता हूँ ...

आँखों में लिखी बातें कभी जुबां की हो न सकी,
हूँ  आईने में अब खड़ा,  क्यूँ इज़हार करता हूँ.... 

दीवारों पे बसाये मैंने मुहब्बत के अफ़साने,
न लगी खबर उनको , क्यूँ इश्तहार करता हूँ...

पाया है ज़ख्म जब भी गुजरा उनकी गलियों से,
उस सितमगर को क्यूँ ,  दोस्तों में शुमार करता हूँ ... 

आवाज गुम  जाती है, फासले की दुनियाँ में,
पास  वो न आए कभी , क्यूँ   इसरार करता हूँ...

बताते बताते  , छुपाया है हरदम,
पर जताने की ये कोशिश , क्यूँ हर बार करता हूँ...

हूँ न उनकी निगाहों में, न उनके ख़यालों में, 
पर हर सूरत मेँ उनका क्यूँ दीदार करता हूँ ...

होगा  उनकी किताबों में  संगीन   मेरा ज़ुल्म,
पर मैं आदमी हूँ ,आदमी से प्यार करता हूँ ...
.....रजनीश (31.01.2011)

Sunday, January 23, 2011

पोर्ट्रेट -3 (आत्मज्ञान!)

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जब भी उस राह से गुजरता हूँ,
वो मिलता है  ,
जिसकी दुनिया, उस एक खंबे से कुछ दूर 
जाकर  ही खत्म हो जाती है ,
मेरा भी फैलाव कितना कम है ,
मैं  भी तो एक लकीर पर चलता
बस एक छोर से दूसरे छोर को नापता रहता हूँ,
उस लकीर से बाहर कहाँ हूँ मैं ?

कल जब गुजरा था उसके करीब से,
तो उसके बदन की बदबू और चमड़ी पे चिपकी धूल की परतों
से लगा जैसे वो सदियों से नहीं नहाया,
जब पलटा और देखा अपने हाथ से
खुद के चेहरे को रगड़कर , कितनी कालिख थी,
मैंने देखा मेरे सिर पर कितना कूड़ा लदा है ,
और कीचड़ में खड़ा हूँ मैं  ,

फटे थे उसके कपड़े, झांक रही थी उसकी हड्डियाँ ,
अधनंगा , परत दर परत कपड़े लपेटे ,
पर जो खुला सो खुला ही था, कपड़े हारे हुए बस लटके थे ...
मैंने देखा मेरे कपड़े भी तो पारदर्शी हैं ,
कुछ नहीं छिप रहा उनसे , मुझे लगा जैसे
अपने कपड़ों पर किसी वृत्तान्त की तरह लिखा हुआ हूँ मैं ,

न वो किसी की बाट जोहता मिला कभी ,
न किसी और को देखा उसकी फिक्र करते ,
बस लोहा हो चुकी दाढ़ी पर हाथ फेरते
आसमान से पता नहीं क्या चुनता रहता है,
मैंने पाया मेरा इंतजार भी किसी को नहीं,
मेरे फिक्रमंद, दिल का हाल नहीं पूछते
क्योंकि दिल दुखाना नहीं चाहते ,
और उड़ना मेरी आदत है , 
इसलिए जब वो कुछ चुनता है आसमान में,
तो कई बार मेरे  पंख टकराए हैं उससे ,

उसके चेहरे पर एक विराम दिखता है,
कोई भाव आते-जाते नज़र नहीं आए कभी,
बस ,वो कभी नीचे देख मुस्कुरा देता है ,
मैं भी कभी कभी मुंह छुपा रो लेता हूँ ,
हँसता भी हूँ पर वो एहसास अक्सर गुम जाते हैं ,
उसने कुछ लकड़ियों से एक घर बनाया है
पर इतना छोटा कि खुद तो बाहर ही रहता है ,
मैंने देखा मेरा घर भी कितना छोटा है
ज्यादा लोग उसमें समाते ही नहीं,मैं भी पूरा नहीं समाता ,
मेरे पास अपने लिए ही जगह नहीं है...
उसे मैंने कभी कुछ कहते देखा , सुना नहीं
और मेरे कहे का भी तो कोई मतलब नहीं होता अक्सर...

उसके सामने से रोज गुजर कर ये जाना कि,
जो होता है वो मुझे भी दिखता नहीं, जो दिखता है मैं समझता नहीं ,
जो समझता हूँ वो मैं भी कहता नहीं, जैसा कहता हूँ वो करता नहीं,
जो करता हूँ उसका प्रयोजन नहीं समझता , कहाँ जा रहा हूँ पता भी नहीं ....
उसे रोज-रोज खंबे के पास
देखते-देखते अब ये यकीन हो गया है,
मुझे, कि हम दोनों पागल हैं ...
कम से कम मैं तो जरूर हूँ ....
...रजनीश (23.01.2011)

Saturday, January 22, 2011

व्याकरण और शब्दकोश

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चेहरे पे लिखी इबारत,
पढ़ना हो तो,
सिखाए गए व्याकरण से रिश्ता
तोड़ना पड़ता है,
भाषा की स्कूली किताब ,
वापस रखनी होती है शेल्फ मेँ ...
क्योंकि यहाँ शब्द एक लाइन में नहीं होते ,
पहले अल्प विराम और
फिर उसके बाद हो सकता है-
कई जाने-अनजाने चिन्हों के साथ 
कोई टूटे -फूटे शब्दों का कारवां,

चेहरे पर लटकती लिखावट में
भूतकाल  आ सकता है वर्तमान मेँ ,
प्रश्न हो जाता है उत्तर
और उत्तर मेँ मिलते हैं प्रश्न ,
चेहरे पर उभरे- इस मौजूद पल मेँ-
मुस्कुराते हुए शब्दों मेँ,
भविष्यकाल की किसी आशा
से   मुलाकात हो सकती है,
जो मैं है ,वो तू हो सकता है ,
और तू है , वो हो सकता है मैं...

चेहरे पर लिखी इबारत समझने मेँ,
खरीदे गए और अपने बनाए शब्दकोश  भी काम नहीं आते  ,
क्योंकि , खुशी के घर मेँ आपको
दुख का बसेरा मिल सकता है चेहरे पर,
ढाई आखर का अभिमान हो सकता है,
और घृणा मेँ लालसा.....
मेरा-तेरा , अच्छा-बुरा हो सकते हैं समानार्थी...
कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं ...
क्योंकि यहाँ कोई आत्मा नहीं रहती शब्दों में ,
और वो बदल-बदल मुखौटे  फिरते हैं चेहरों पर,

फिर जो चेहरे पर लिखा होता है ,
वो कभी-कभी छूने पर गुम हो जाता है,
कोई शब्द कभी  छुप जाता है,
और आँखेँ गड़ाकर देखो तो
कभी कोई अपना रूप ही बदल लेता है ,
ज्यादा करीब आओ
तो सारे के सारे  गुम हो सकते हैं
क्योंकि चेहरे पर उनके घर नहीं होते ,
वो भीतर चले जाते हैं ...
बड़ा विचित्र है उनका ठिकाना ,
जहां बैठा कोई पहनाता रहता है इन्हें मुखौटे ,
वो रहते हैं उस तिलस्म मेँ ,
जहां पर धड़कता है दिल,
वहाँ से बस कुछ बित्ते की दूरी पर ,
उनके कुछ कमरे ऊपर भी हैं 'भेजे' में  ,
कहाँ रहें , कहाँ से चलें ...
इसी ऊहापोह में शब्द भी थक जाते हैं कई बार,

ये शब्द नौकरी करते मिलते हैं
एक "अव्यक्त" की ,
जिसे  छुपाने या उभारने मेँ लगे होते हैं ये शब्द ,
जो चलते-चलते जुबां तक पहुँच पाते हैं
उन्हें सुन भी सकते हैं आप ,
बाकी इधर-उधर,
मसलन आंख वगैरह पर खड़े मिलते हैं  

बोलते चेहरे की बात
समझने /और झाँकते, फिरते शब्दों को पहचानने  -
उनके घर- उस तिलस्म तक जाना
होता है , और यारी करनी पड़ती है उनसे ,
खुद को बाहर फेंक कर वहीं रहना पड़ता है ,
वही चेहरा बन जाना होता है,
और तब शब्द , 
व्याकरण की असली किताब और असली डिक्शनरी
खुद ही लाकर रख देते हैं
आपके हाथों मेँ ....
....रजनीश (22.01.2011)

Wednesday, January 19, 2011

रात से बात

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जब चाँद- तारे 
रज़ाई ओढ़े, सो गए थे ,
हवा भी थकी ,
आंखे मूँदे ,लेटी थी पत्तों पर ,
सारे पंछी ,
चुग्गा-दाना भूले ,
अँधियारे में गुम गए थे...
और  जलते दिये का तेल,
लड़ते हुए अंधेरे से, खप गया था ,
सूखती बाती, हाँफते दिये की छाती
पर अब कालिख छोड़ रही थी,
तब,  कल 'रात' आई थी
मेरे कमरे में ,
पर मैं उसे नहीं मिला वहाँ ,
फिर  जब हवा ने अंगड़ाई ली
और  आँगन साफ किया-
सुनहली किरणों के लिए,
जाते जाते 'रात' ने पूछा था मुझसे,
कहाँ चले गए थे तुम ?
मैंने कहा तेल ढूंढ रहा था मैं,
बगल के कमरे मेँ,
'दिये' के लिए गया था वहाँ ,
एक सपना है.  दरअसल कुछ पुराना,
वो भी  तो है मेरे संग,
भटकते यूं ही आ गया था कभी ,
और तब से मेरे साथ ही रहता है,
भूल गया हूँ उसकी उम्र,
उसके चेहरे से भी पता नहीं कर पाता ,
सामने वाले पेड़ पर
हर साल पत्ते बदलते हैं,
पर इसका चेहरा बिलकुल नहीं बदला,
वो नहीं दिखा तुम्हें ? ,
वहीं बिस्तर पर तो था !
चादर मेँ छुपा था,
वही जगाए रहता है मुझे ,
दोनों ही जागते हैं,
सपना मेरे लिए और मैं सपने की खातिर,
तुम औरों की फिक्र करो...
उन्हें सुलाओ ...
थक गई होगी, जाओ अब आराम करो,
सपना भी वहीं साथ खड़ा था
मेरे कंधे पर हाथ डाले ,
फिर हम दोनों ने मिलकर 'रात' को विदा किया .....
......रजनीश (19.01.11)

Sunday, January 9, 2011

कुछ अहसास ऐसे होते हैं ....

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आप इसे यहाँ मेरी आवाज में सुन सकते हैं ....
कुछ अहसास ऐसे होते हैं ....
जो रहते हैं  बहुत दूर, शब्दों से ,
पर उन्हे छूने  कहीं जाना नहीं होता,
बस यहीं खड़े ,
करना होता है बंद आंखे,
और वो खुद बंधे चले आते हैं ।

कुछ अहसास ऐसे होते हैं ....
जो  नहीं रहते हैं अब यहाँ ,
पर मरते नहीं  कभी, न बिछुड़ते हैं,
साल दर साल, 
जब भी पलाश पर फूल खिलता है ,
वो खुद मिलकर चले जाते हैं ।

कुछ अहसास ऐसे होते हैं....
जो बंधते नहीं किसी धागे से,
जिनका एक चेहरा नहीं होता ,
बस दो पल फुर्सत के निकाल,
करनी होती है बातें आइने से,
वो खुद ही सामने उभर आते हैं।

कुछ अहसास ऐसे होते हैं....
जो कभी जनम नहीं पाते ,
जिनकी किलकारियाँ सुनाई नहीं देती,
ज़िंदगी की इस दौड़ में,
इससे पहले कि  आ सकें  ऊपर,
वो पैरों तले रौंद दिये जाते हैं ।
............रजनीश (09.01.11)
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